Saturday, October 3, 2015

देश मे कभी जब अग्रेजो की सरकार रही होगी तब के लोग जाने की उनका शासन केसा रहा होगा1लेकिन किवद्ति बन चुकि उस सरकार के काम करने के तरीके वाकई लाजवाब रहे होगे वरना आजाद भारत के लोग आज 150 साल गुजरने के बाद अपने देश की अपनी सरकार से यू नाउम्मीद न हो गये होते1हर कही आते जाते,चोपलो पर ,बस मे,ओर हर उस जगह जहा ज्यादा लोग जमा हो बस ये जुमला न सुनने को मीलता की भारत मे बस एक ही चीज ह जोकि चर्चा के काबिल ह ओर वो ह अव्य्वस्था1मुझे भी एसा ही लगता ह1लेकिन अगर एसा ह भी तो क्या किया जाय1थाने मे काम को जाते ह तो बिन दान दिये कोई काम होना मुश्किल ह1रेल मे शफर करना हो तो बिन पेसे दिये जगह मिलना नामुमकिन1दफ्तर जाओ तो बाबु की सेवा जरूरी1सब तरफ जहा नजर जायगी यही होगा1उसके बावजूद भी जीवन रूक तो नही ही जायगा1घर मे राशन जितना भी आ रहा ह आ ही रहा ह जा तो नही रहा1दफ्तरो मे बाबु लोग आपके इन्त्जार मे दिन गुजार देते ह कभी घर खाली हाथ भी आना हो जाता ह1राह बना रहे लोग अगर कोलतार की जगह सीरा इस्तेमाल कर रहे ह तभी क्या गजब हो गया वो भी तो फ्री नही आ रहा1 ओर भी एसी बहुत सी जगह काम ओर मुद्दे ह जिनमे हम कमी तलाश ही लेगे लेकिन वास्तव मे उसमे कमी बस इतनी सी ह कि हम सरकार को अपने द्वरा चुनी गैइ सस्था मान लेते ह 1सब चीजे हजारो बार कही जा चुकि ह1सरकारी दफ्तर या लोग अगर नही सुधर सकते तो1एक ही चीज बाकी रहती कि समझोता कर लिया जाये1हालातो से उन सबके जहा से की हमारा रोज वास्ता बनता ह1 
फिल्मे समाज का आइना होती हे1'वास्तव' फिल्म जहा हालात के हाथो मजबूर एक शरीफ कामकाजी आदमी को अपने वास्तविक समाज से बेदखल कर जरायम की दुनिया मे पेबस्त करने का सन्देश देती हे1वही एक आम सी अदना सी कम खर्च वाली जोली एल एल बी फिल्म हमारी न्यायिक व्य्वस्था के भीतर लगी दीमक से हमे रूबरू कराती हे1 एसे ही ओर न जाने कितनी फिल्मे बन चुकि ओर बनने को लगातार जारी हे जिन्होने व्य्वस्था  के हर स्वरूप के भीतर फेली अव्य्वस्था को पूरी ईमानदारी के साथ कलात्मक रूप मे हमारे सामने उजागर करते हे1चला मुसद्दी ओफिस ओफिस भी उसी की बानगी बानगी भर ह1लेकिन सिनेमा होल मे जब हम फिल्म को देख रहे होते हे जोली एल एल बी का त्यागी हो या चला मुसद्दी का मुसद्दी लाल सबके भीतर हमे अपना अक्स दिखाई देता ह1आखिर क्यो? यही वो अहम सवाल हे जोकि ईन फिल्मो के निर्मान हेतु किसी जज्बाती आदमी को प्रेरित कर्ता हे कि चलो अदालतो मे न्याय के नाम पर गरीबो मजलूमो को जो सालो साल कुत्ते की तरह यहा से वहा दुत्कार खाने को मजबूर किया जा रहा हे जो नही हुआ उसे साबित करने की जो कलाकारी वहा चल रही ह1 उसे समाज के सामने कुछ यू भावनात्मक रूप मे पेश किया जाय जिस्से कि आम आदमी के भीतर सोई चिगारी को कुछ हवा मिले वरना रोज कही न कही वो सब होता तो हमारे साथ ही ह

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दोबारा मुझे मेरा ब्लोग मिला बहुत दिन से दिल के भीतर भाव्अनाए उद्गार के रुप मे कलम के जरिये बाहर निकलना चाह रहे थे1तबसे आज तक समाज मे बहुत बद्लाव भीआय हे1थानो मे गरीब को सिकायत सुने बिना जाने कितनी बार भगाया गया होगा1अदालतो  मे जाने कितने बेकसुरो को सजा सुनाइ गई होगी1चोपाले चोराहो पर तो व्य्वस्था को लेकर चर्चा हमेशा जारी रहेगी1लेकिन फायदा क्या जब तक कुछ सकारात्म्क न लिख जाये 1

Sunday, December 4, 2011

आधा विश्व: आधा विश्व: आधा विश्व: दुनिया

पिछले दिनो इसी ब्लाँग साइट पर एक साथी ब्लाँगर का मै ब्लाँग पढ रहा था।मदर्स डे के मोके पर लिखा गया ब्लाँग मा के विषय मे लिखा गया था।ब्लाँग हालाकि लिखा तो व्यापक मुद्दे पर गया था लेकिन लेखक की मानसिकता मानो उस वक्त मा मयी नही हो पायी थी ईसलिये उथले रुप मे छोटा सा लेख लिखकर छोड दिया गया मैने उसे पढकर सोचा था कि आगे मै कुछ लिखने की कोशिस करूँगा।लेखक तब बहुत अच्छा लिख लेता है जबकि घटनाये उसके उपर से गुजरी हो।उस लेख ने मुझे ईस शीर्षक से एसा जोडा कि आम जीवन की नयी और पुरानी घटनाये दिमाग के कोने मे इकट्ठा हो गयी जो की बिल्कुल वास्तविक थी।
रात को सोते से मेरी आँखे खुली तो मैने झुझलाकर पत्नि की तरफ देखा।वो बडी तल्लीनता के साथ मेरे नवजात बच्चे का नेपकिन बदलने मे तल्लीन थी।मुझे झूझलाया देखकर वो इतमिनान के साथ बोली,"पेशाब कर दिया था अब रोना बन्द कर देगा आप आराम से सो जाओ"बच्चे का तो काम रोज पेशाब करने का था और सारी सारी रात रोने का तो आम था।उसके बावजूद उसके चेहरे का इतमिनान देखकर मेरी झुझलाहट तो गायब हो ही गयी लेकिन जब गीले हिस्से से बच्चे को उठाकर खुद वह गीले मे इतमिनान से लेट गयी तो मै हीन भावना से भर उठा।आध्यात्म की एसी बरसात हुइ कि मन अतीत के उस बिन्दु पर पहुँच गया जब मै खुद बच्चा था।मा दिनभर मुझे तथा सब भाइ बहनौ को एसे रखती जैसे वो कोइ अबोध बालक हो ओर हम उसके अनमोल आकर्षक खिलोने।सुबह चार बजे से उठकर पहले परिवार के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करती और फिर अपनी सारी ममता को एकजुट करके हमारे रख रखाव मे लीन हो जाती।खाने के समय उसकी कौशिश होती कि हमे सारा खाना खिलादे।अपने लिये कोइ चिन्ता नही।क्इ बार सब्जी खत्म हो जाती लेकिन सन्तुष्टि भगवान से दो हाथ आगे।हम उस वक्त बहुत छोटे थे ।सोचते थे कि मा का दायित्व उस दिन शायद खत्म हो जायेगा जबकि हम बडे हो जायेगेँ।लेकिन हमारे धैर्य ओर उम्मीद से मा के दायित्व आज तक आंके नही जा सके आज मेरी मा बूढी हो चुकि है और हम बच्चो के बाप लेकिन मा कि नजर मे मानो आज भी हम छः माह के अबोध है।क्इ बार मैने अपनी मा को अपनी लेखनी के आयने से देखने की कोशिश की लेकिन हर बार लेखनी की क्षमता मा की ममता नापने से चूक जाती रही।

Monday, November 28, 2011

आधा विश्व: आधा विश्व: आधा विश्व: दुनिया

छोटी जीवनलीला।

क्ई हट्टेकट्टे लोग जो पूरे स्वस्थ दिखाई देते थे आजकल भगवान के दरबार की कही शोभा बढा रहे होगे।

ANURAG: ANURAG: ANURAG: HAPPY HOLI............

"महंगाँई हल हो ग्ई है"।-

Sunday, November 27, 2011

आधा विश्व: आधा विश्व: दुनिया

महगाँई से बोखलाए सारे तमाचे आजकल किसी अनूकूल गाल की तलाश मे भटकते दिखाई देते है।एसा बस लोग अनुमान करते है कि महँगाई ने उन तमाचो को ईतना हिँसक बना दिया है कि गाल दिखाई दिया नही कि वे अपने आपको सम्भाल नही पाते।वास्तव मे ईस अलगाव कि असल वजह खुद उन तमाचो को भी मालूम नही।वजहे जब गणना के दायरे से बाहर हो जाती है तो हमे मालूम ही नही रहता कि हमारा आक्रोश बावजह भी है।मैरे तमाचे मे भी आक्रोश की माकूल भावनाए पैदा हो रही है लेकिन मेरे तमाचे को अभी बहुत संतोष करना पडेगा क्योकि लाइन बहुत लम्बी हो चुकि है।एक बडी पेचीदा समस्या ओर भी है जिसका समाधान शायद सरकार के बजट मे हो यह कि असँख्य तमाचो के सामने मुह तो उगलीयो पर गिने जाने लायक है एसे मे सभी तमाचो के शाथ न्याय का तत्काल कोई उपाये किया जाना चाहिए।कम से कम दस तमाचो पर एक गाल तो होना ही चाहिए ताकि अन्तरष्ट्रीय मानक के थोडा तो करीब हो।
कल एक आदमी अपने स्तर के एक आदमी के साथ लडते लडते इतना तैश मे आया कि वो तमाचा मारने लगा शुक्र है कि मै समय पर पहुच गया वरना तमाचे के प्रोटोकोल से अनभिज्ञ वे साधारण आदमी गलत कर जाते।मैने विस्तारपूर्वक समझाया-"हे लोकतन्त्र के सातसौ वे स्तम्भ आप क्या अधर्म करने जा रहे थे।आपको शायद मालूम नही आपका तमाचा वास्तव मे ब्रह्मश्त्र है जिसके युँ आपस मे प्रयोग से न तो उचित प्रचार मिलेगा और न ही सुधार का कोई मार्ग।आपको चाहिये कि एक फार्म भरकर तमाचे राष्ट्रीय प्रर्दशन मे भागीदार हौ क्या पता आपका तमाचा एसे किसी गाल की शोभा बने जो कि दुर्लभ तथा अनछुआ हो।"
मेरे तमाचा ज्ञान से वे इतने प्रभावित हुए कि पहले तो आपस मे गले मिले और मुझसे फार्म की वेबसाइट पता की ओर खुशी खुशी घर चले गये।
धीरज पुन्डीर